माता शाकम्भरी देवी जन्मोत्सव सोमवार 17 जनवरी 2022
शाकंभरी नवरात्रि का समापन पौष पूर्णिमा को होता है जिसे शाकंभरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. शाकंभरी उत्सव की समाप्ति *पूर्णिमा पर होने से यह समय शाकंभरी जयंती के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी शाकंभरी ने उसी दिन अवतार लिया था.* शाकंभरी नवरात्रि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में विशेष लोकप्रिय रहा है इसी के साथ देश भर में भक्त इस दिन को भक्ति और उल्लास के साथ मनाते हैं।
शाकंभरी उत्सव पौराणिक महत्व
शाक सब्जियों की अधिष्ठात्रि देवी के रुप में जीवन प्रदान करने वाली माता अपने समस्त भक्तों का कल्याण करती हैं. देवी को अनेकों नामों से भी जाना जाता है. देवी के महत्व के विषय में *दुर्गासप्तशती एवं देवी पुराण में उल्लेख मिलता है. देवी के कुछ नामों में वनशंकरी और शताक्षी भी उल्लेखनीय है. देवी पुराण अनुसर शाकंभरी जी देवी दुर्गा का ही रुप हैं और देवी ने भगवान शिव को प्राप्ति करने हेतु कठिन तप किया था और अपने उस तप में देवी ने केवल वनस्पतियों को भोजन रुप में ग्रहण किया तब वह शांकभरी के नाम से विख्यात होती हैं और दूसरी कथा अनुसार जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होती है तो अकाल की स्थिति के कारण चारों ओर प्राणियों के जीवन को संकट उत्पन्न होता है।
ऎसे में ऋषि मुनियों की प्रार्थना से प्रसन्न हो माता पृथ्वी पर वनस्पतियों को उत्पन्न करती है* जिस के कारण सभी प्राणियों की क्षुद्धा शांत होती है और माता शाकंभरी के रुप में विख्यात होती हैं. देवी ने सृष्टि के कल्याण हेतु जो भी कार्य किए हैं वह सभी प्राणियों के लिए कल्याणदायक रहें हैं अत: माता के इस स्वरुप का पूजन समस्त जगत के कल्याण का आधार है।
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